दोस्तो,
वर्षा ऋतू मे किसी का दिल बिना झूमे भला कैसे रह सकेगा? भले ही इस साल बारिश कुछ देरी से शुरू हुई हो, इसके रंग मे पूरा जहॉं डुब चुका है। बारिशसे संबंधित हिंदी सिनेमामे कई गीत है। आज मै आपको एक सुरीला नग्मा पेश कर रहा हू। वर्षा ऋतू का असर तो पूरी कायनात पर होता है। लेकीन, इसमे किसी का भावावेश जुड जाए तो क्या बात है! मंजिल सिनेमा यह गीत भी कुछ इस प्रकार का ही है। ‘सावन’से पुरी सृष्टी जैसे नाचने लगती है। नायक और नायिका को भी इसने जरूर छुआ है। लेकीन, उनके मनकी भावना कुछ और ही कह रही है। इस भिगे हुए मौसम मे कोई अपनासा लग रहा है। लेकीन उसे कहे भी तो कैसे? इसी कश्मकश को बहोत बढीया रूपसे इस गीत मे पिरोया है। भलेही उसमे सावन का प्राकृतिक सौदर्य नही, लेकीन प्रेम के अभिव्यक्ती की तडपन इसमे खूब झलकती है।
रिमझीम गिरे सावन सुलग सुलग जाए मन
भिगे आज इस मौसममे लगी कैसी ये अगन....
रिमझिम गिरे सावन!
जब घुंगरूओंसी बजती है बुंदे...
अरमॉं हमारे पलके ना मुंदे
कैसे देखे सपने नयन सुलग सुलग जाए मन
भिगे आज इस मौसममे लगी कैसी ये अगन....
रिमझिम गिरे सावन!
महेफिल मे कैसे कहदे किसी से
दिल बंध रहा है किसी अजनभी से
हाय करे अब क्या जतन...... सुलग सुलग जाए मन
भिगे आज इस मौसममे लगी कैसी ये अगन....रिमझिम गिरे सावन!
चलिए ‘यू ट्युब’ के माध्यम से इस मीठे गीत का आनंद लेते है।
(गीत के बोल ‘गीतमंजुषा’ से साभार)
Tuesday, July 14, 2009
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